Sunday, 14 August 2011

कह दे ज़रा

 कह दे ज़रा ,ज़रा सा तो सही
अभी नहीं पर देर से ही सही
लफ्ज़ हो ऐसे की सुकून मिल जाए
तनहा उन रातों से बात हो जाए ||
 अधूरी सी ख्वाबो में दिखती हो तुम
 अब तो चाँद की भी आँखों में छुपती हो तुम||
कहना उस चाँद से कि तारे गिरा दे
पूरी कुछ मेरी अब ख्वाहिशें करा दे||
अरसो से तेरी आहटों का एक भी साया नहीं है
फिर क्यूँ आज भी ये सब पराया नहीं है
होती सामने तो ये सारी अजनबी बातें ना होती
क्यूंकि तुम्हारे चाँद को देखकर मेरी सारी ख्वाहिशे पूरी हो रही होती |||